तुम रहे ना अब तुम्हारे गम रहे
अब कहाँ वो पहले जैसे हम रहे
रंज से खूंगर न हो पायें हैं हम
गालिबन तोहफे तुम्हारे कम रहे
तेरी जुल्फों के न साए थे मगर
जिन्दगी भर कितने पेंचोखम रहे
बात करते भी तो कैसे करते हम
दोनों अपनी बात पे कायम रहे
बस्तियां क्या बादलों की हैं वहां
मौसमे दिल क्यूँ हमेशा नम रहे
रात उन हाथों में ही पत्थर दिखे
थामते दिन भर जो ये परचम रहे
एक लम्हा भी न सोये चैन से
ख्वाब ऐसे आँखों में हरदम रहे
ये रकीबों की रही बदकिस्मती
मेरे कोई दोस्त ना हमदम रहे
पाँव फ़ैलाने को जी तो है बहुत
ये बरसती छत अगर जो थम रहे
जिक्र उसका फिर करे मेरी ग़ज़ल
नासमझ! क्या टाट में रेशम रहे!
Monday, September 20, 2010
Wednesday, September 1, 2010
...... मर गया
क्यूँ कहते हैं आखिर ये सब ..जो डर गया सो मर गया
मेरा तो सारा डर गया मैं जब से देखो मर गया
अब आईने को देख कर मैं सोचता हूँ बस यही
है कौन ये जिंदा है जो, वो कौन था जो मर गया
क्यूँ हैं तेरी आँखें ये नम किस बात का अफ़सोस है
जिंदा यहाँ पे कौन था.. जो सोचते हो मर गया
इन ख्वाहिशों ने क़त्ल यूँ मेरा किया चुपचाप से
जिस रोज़ मैं पैदा हुआ उस शाम ही को मर गया
मेरी हैसियत कुछ और थी मेरी कैफियत कुछ और थी
किश्तों पे मैंने गम लिए.. ना भर सका तो मर गया
ना जाने कितनी ही दफा ये वाकया अब हो चुका
जिन्दा रहूँ मैं इसलिए इक बार फिर लो मर गया
जब मौत ने मेरा पता पूछा तो लोगों ने कहा
रहता था जो इन्सां यहाँ मुद्दत हुयी वो मर गया
कैसे जियूं कैसे मरुँ इस दिल का अपने क्या करूँ
तुझे पा के तुझ पे मर गया तुझे जब दिया खो, मर गया
नफरत सही मुझसे मगर मैं जानता हूँ आज भी
आएगा वो दौड़ा हुआ बस इतना कह दो मर गया
तेरी याद की खुशबू नहीं तेरे रूप का चर्चा नहीं
मैं जब कहूँ ऐसी ग़ज़ल उस रोज़ समझो मर गया
मेरा तो सारा डर गया मैं जब से देखो मर गया
अब आईने को देख कर मैं सोचता हूँ बस यही
है कौन ये जिंदा है जो, वो कौन था जो मर गया
क्यूँ हैं तेरी आँखें ये नम किस बात का अफ़सोस है
जिंदा यहाँ पे कौन था.. जो सोचते हो मर गया
इन ख्वाहिशों ने क़त्ल यूँ मेरा किया चुपचाप से
जिस रोज़ मैं पैदा हुआ उस शाम ही को मर गया
मेरी हैसियत कुछ और थी मेरी कैफियत कुछ और थी
किश्तों पे मैंने गम लिए.. ना भर सका तो मर गया
ना जाने कितनी ही दफा ये वाकया अब हो चुका
जिन्दा रहूँ मैं इसलिए इक बार फिर लो मर गया
जब मौत ने मेरा पता पूछा तो लोगों ने कहा
रहता था जो इन्सां यहाँ मुद्दत हुयी वो मर गया
कैसे जियूं कैसे मरुँ इस दिल का अपने क्या करूँ
तुझे पा के तुझ पे मर गया तुझे जब दिया खो, मर गया
नफरत सही मुझसे मगर मैं जानता हूँ आज भी
आएगा वो दौड़ा हुआ बस इतना कह दो मर गया
तेरी याद की खुशबू नहीं तेरे रूप का चर्चा नहीं
मैं जब कहूँ ऐसी ग़ज़ल उस रोज़ समझो मर गया
और बेहतर कलाम क्या करते
तेरे पहलू में शाम क्या करते
उम्र तेरी थी , नाम क्या करते
तेरी महफ़िल में हम जो आ जाते
लोग किस्से तमाम क्या करते
आसमां तेरा ये जमीं तेरी
हम जो करते मुकाम क्या करते
होश में आते हम भला क्यूँ कर
सारे खाली थे जाम , क्या करते
कशमकश आग की उसूलों से
मौम के इंतजाम क्या करते
सच के फिर साथ चल नहीं पाए
झूठ पे थे इनाम, क्या करते
कांच का था ये दिल जो टूटा है
इत्तला खासोआम क्या करते
जब से होने लगे खुदा बौने
कीये झुक झुक सलाम, क्या करते
सूलियां और दिवार तलवारें
गर न होतीं निजाम क्या करते
फिर लड़े खूब मंदिरोमस्जिद
क्या खुदा करते, राम क्या करते
नाम तेरा ही बस लिखा हमने
और बेहतर कलाम क्या करते
उम्र तेरी थी , नाम क्या करते
तेरी महफ़िल में हम जो आ जाते
लोग किस्से तमाम क्या करते
आसमां तेरा ये जमीं तेरी
हम जो करते मुकाम क्या करते
होश में आते हम भला क्यूँ कर
सारे खाली थे जाम , क्या करते
कशमकश आग की उसूलों से
मौम के इंतजाम क्या करते
सच के फिर साथ चल नहीं पाए
झूठ पे थे इनाम, क्या करते
कांच का था ये दिल जो टूटा है
इत्तला खासोआम क्या करते
जब से होने लगे खुदा बौने
कीये झुक झुक सलाम, क्या करते
सूलियां और दिवार तलवारें
गर न होतीं निजाम क्या करते
फिर लड़े खूब मंदिरोमस्जिद
क्या खुदा करते, राम क्या करते
नाम तेरा ही बस लिखा हमने
और बेहतर कलाम क्या करते
Wednesday, August 25, 2010
क्या बात है!!
गुमसुम हैं क्यूँ ? क्यूँ हैं खफा! कुछ तो बता ,क्या बात है?
यूँ भी बहुत.. है खूब तू.. पर ये अदा! ..क्या बात है!!
ये भी चलो.. अच्छा हुआ.. दोनों रहे खुश इस तरह
तुम ने कहा.. 'है बात क्या '..मैंने सुना.. 'क्या बात है!'
जी लीजिये.. मर जाइए.. आ जाइए.. ना आइये
फुरसत किसे ..है आजकल.. पूछे जरा क्या बात है?
चाहत तेरी.. चर्चा तेरा.. खुशबू तेरी जलवा तेरा
महफ़िल हो या.. गुलशन कोई.. इसके सिवा क्या बात है.
यूँ टपकी है.. फिर से मेरे.. कमरे की वो.. छत रात भर
जैसे कोई ..रोता रहा.. कह ना सका ..क्या बात है.
वाकिफ हूँ मैं.. दीवारों की.. आदत से यूँ अच्छी तरह
मैंने कहा ..कुछ भी नहीं.. सुनता रहा क्या बात है.
चाहा बहुत.. शिकवा करूँ ..अबकि खुदा.. से मैं लडूं
तोहफा मिला ..जब दर्द का.. कहना पड़ा क्या बात है!!
जाने लगीं.. साँसे मेरी.. आने लगा रुखसत का दिन
अब जा केये.. आया समझ.. मसला है क्या, क्या बात है.
नासेह बड़ी.. मुश्किल में है.. क्या तो कहे.. क्या ना कहे
खुद ही कही.. हमने ग़ज़ल.. खुद ही कहा.. क्या बात है!!
यूँ भी बहुत.. है खूब तू.. पर ये अदा! ..क्या बात है!!
ये भी चलो.. अच्छा हुआ.. दोनों रहे खुश इस तरह
तुम ने कहा.. 'है बात क्या '..मैंने सुना.. 'क्या बात है!'
जी लीजिये.. मर जाइए.. आ जाइए.. ना आइये
फुरसत किसे ..है आजकल.. पूछे जरा क्या बात है?
चाहत तेरी.. चर्चा तेरा.. खुशबू तेरी जलवा तेरा
महफ़िल हो या.. गुलशन कोई.. इसके सिवा क्या बात है.
यूँ टपकी है.. फिर से मेरे.. कमरे की वो.. छत रात भर
जैसे कोई ..रोता रहा.. कह ना सका ..क्या बात है.
वाकिफ हूँ मैं.. दीवारों की.. आदत से यूँ अच्छी तरह
मैंने कहा ..कुछ भी नहीं.. सुनता रहा क्या बात है.
चाहा बहुत.. शिकवा करूँ ..अबकि खुदा.. से मैं लडूं
तोहफा मिला ..जब दर्द का.. कहना पड़ा क्या बात है!!
जाने लगीं.. साँसे मेरी.. आने लगा रुखसत का दिन
अब जा केये.. आया समझ.. मसला है क्या, क्या बात है.
नासेह बड़ी.. मुश्किल में है.. क्या तो कहे.. क्या ना कहे
खुद ही कही.. हमने ग़ज़ल.. खुद ही कहा.. क्या बात है!!
..... मर गया
क्यूँ कहते हैं आखिर ये सब ..जो डर गया सो मर गया
मेरा तो सारा डर गया मैं जब से देखो मर गया
अब आईने को देख कर मैं सोचता हूँ बस यही
है कौन ये जिंदा है जो, वो कौन था जो मर गया
क्यूँ हैं तेरी आँखें ये नम किस बात का अफ़सोस है
जिंदा यहाँ पे कौन था.. जो सोचते हो मर गया
इन ख्वाहिशों ने क़त्ल यूँ मेरा किया चुपचाप से
जिस रोज़ मैं पैदा हुआ उस शाम ही को मर गया
मेरी हैसियत कुछ और थी मेरी कैफियत कुछ और थी
किश्तों पे मैंने गम लिए.. ना भर सका तो मर गया
ना जाने कितनी ही दफा ये वाकया अब हो चुका
जिन्दा रहूँ मैं इसलिए इक बार फिर लो मर गया
जब मौत ने मेरा पता पूछा तो लोगों ने कहा
रहता था जो इन्सां यहाँ मुद्दत हुयी वो मर गया
कैसे जियूं कैसे मरुँ इस दिल का अपने क्या करूँ
तुझे पा के तुझ पे मर गया तुझे जब दिया खो, मर गया
नफरत सही मुझसे मगर मैं जानता हूँ आज भी
आएगा वो दौड़ा हुआ बस इतना कह दो मर गया
तेरी याद की खुशबू नहीं तेरे रूप का चर्चा नहीं
मैं जब कहूँ ऐसी ग़ज़ल उस रोज़ समझो मर गया
मेरा तो सारा डर गया मैं जब से देखो मर गया
अब आईने को देख कर मैं सोचता हूँ बस यही
है कौन ये जिंदा है जो, वो कौन था जो मर गया
क्यूँ हैं तेरी आँखें ये नम किस बात का अफ़सोस है
जिंदा यहाँ पे कौन था.. जो सोचते हो मर गया
इन ख्वाहिशों ने क़त्ल यूँ मेरा किया चुपचाप से
जिस रोज़ मैं पैदा हुआ उस शाम ही को मर गया
मेरी हैसियत कुछ और थी मेरी कैफियत कुछ और थी
किश्तों पे मैंने गम लिए.. ना भर सका तो मर गया
ना जाने कितनी ही दफा ये वाकया अब हो चुका
जिन्दा रहूँ मैं इसलिए इक बार फिर लो मर गया
जब मौत ने मेरा पता पूछा तो लोगों ने कहा
रहता था जो इन्सां यहाँ मुद्दत हुयी वो मर गया
कैसे जियूं कैसे मरुँ इस दिल का अपने क्या करूँ
तुझे पा के तुझ पे मर गया तुझे जब दिया खो, मर गया
नफरत सही मुझसे मगर मैं जानता हूँ आज भी
आएगा वो दौड़ा हुआ बस इतना कह दो मर गया
तेरी याद की खुशबू नहीं तेरे रूप का चर्चा नहीं
मैं जब कहूँ ऐसी ग़ज़ल उस रोज़ समझो मर गया
Monday, July 26, 2010
ओ बंदापरवर
सलाम तुझ को करें भी कैसे
छिपा के खुद को रखें भी कैसे
कि चुप ना बैठे ये दिल जरा सा
जो हम कहें कुछ कहें भी कैसे
छिपा है तुझसे क्या बंदापरवर
तेरी नज़र से बचें भी कैसे
मगर ये चादर हैं इतनी मैली
तुझे कभी हम दिखें भी कैसे
हैं लाखों अरमां हैं लाखो शिकवे
कहें, ये जुर्रत करें भी कैसे
मैं जानता हूँ, तू जानता है
कि तुझको गाफिल कहें भी कैसे
जो प्यास दी उसका शुक्रिया है
मगर करम ये कियें भी कैसे
दिए हमें जाम सारे खाली
अगर पियें तो पियें भी कैसे
जो जर्रे जर्रे में तू ही तू है
तो दूर तुझसे रहे भी कैसे
जहां के मालिक जहाँ में तेरे
जो हम न भायें रुकें भी कैसे
छिपा के खुद को रखें भी कैसे
कि चुप ना बैठे ये दिल जरा सा
जो हम कहें कुछ कहें भी कैसे
छिपा है तुझसे क्या बंदापरवर
तेरी नज़र से बचें भी कैसे
मगर ये चादर हैं इतनी मैली
तुझे कभी हम दिखें भी कैसे
हैं लाखों अरमां हैं लाखो शिकवे
कहें, ये जुर्रत करें भी कैसे
मैं जानता हूँ, तू जानता है
कि तुझको गाफिल कहें भी कैसे
जो प्यास दी उसका शुक्रिया है
मगर करम ये कियें भी कैसे
दिए हमें जाम सारे खाली
अगर पियें तो पियें भी कैसे
जो जर्रे जर्रे में तू ही तू है
तो दूर तुझसे रहे भी कैसे
जहां के मालिक जहाँ में तेरे
जो हम न भायें रुकें भी कैसे
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